Hindi Poetry- वादों के सिलसिले भी बड़े लम्बे चले थें !

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वादों के सिलसिले भी 
बड़े लम्बे चले थें,

.
माजी के पन्नों से 
झलकती है 
तेरी नजर उन 
मांद होते पत्तों पर,
.
जो शाख से रुखसत
के खौफ में हीं बूढ़े होते
चले गये..
.
और जब इक दिन तुम
हो मुझसे नाराज,
खिड़की के सिरहाने
जो बैठी थी कॉफ़ी लेकर 
.
और वो पत्ता पीला पड़
चूका था,शाख से खो 
जाने के डर से..
.
आंधी भी चली थी जोर
की मुझे ख्याल है..
.
और फिर बारिशों में
तुम्हारे आँसू भी शायद
छिप गये थे..
.
उसी दिन बाद से
टूटने लगे वादे तेरे
कसमें भी फिर,
खाई नहीं गयीं!
.
पर इक सवाल
अब भी दिल के
किसी वीरान कोने
में खटकता है..
.
क्या वो मांद पीला
पत्ता,सच टूट गया
था,डाली से ??.
.
जो तेरे वादे भी टूटे!!
 
– Vvk
 
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वादों के सिलसिले भी 
बड़े लम्बे चले थें,
.
माजी के पन्नों से 
झलकती है 
तेरी नजर उन 
मांद होते पत्तों पर,
.
जो शाख से रुखसत
के खौफ में हीं बूढ़े होते
चले गये..
.
और जब इक दिन तुम
हो मुझसे नाराज,
खिड़की के सिरहाने
जो बैठी थी कॉफ़ी लेकर 
.
और वो पत्ता पीला पड़
चूका था,शाख से खो 
जाने के डर से..
.
आंधी भी चली थी जोर
की मुझे ख्याल है..
.
और फिर बारिशों में
तुम्हारे आँसू भी शायद
छिप गये थे..
.
उसी दिन बाद से
टूटने लगे वादे तेरे
कसमें भी फिर,
खाई नहीं गयीं!
.
पर इक सवाल
अब भी दिल के
किसी वीरान कोने
में खटकता है..
.
क्या वो मांद पीला
पत्ता,सच टूट गया
था,डाली से ??.
.
जो तेरे वादे भी टूटे!!

Vvk