राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य शपथ करुणानिधान की – सुंदर कांड तुलसीदास रचित रामचरित मानस से

तुलसीदास रचित श्री रामचरित मानस सुंदर  काण्ड से संकलित हनुमान सीता संवाद ..बड़ा ही मार्मिक चित्रण है जब हनुमान जी माँ सीता से लंका में पहली पहली बार अशोक वाटिका में मिलते हैं जब माँ सीता का मन उद्विग्न है और वह अशोक के वृक्ष के नीचे बैठ अपनी विपदा पर प्रलाप कर रही हैं और उपर बैठे हनुमान जी राम नाम की मुद्रिका नीचे गिरा देते हैं ..आगे का प्रसंग पढ़ें और आनंद लें इस भक्ति रस का भक्त कवि तुलसीदास जी के रामचरित-मानस के सुन्दर काण्ड से ..

तब देखी मुद्रिका मनोहर। 
राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
जीति को सकइ अजय रघुराई।
माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
लागीं सुनैं श्रवण मन लाई।
आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई।
कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ।
फिरि बैंठीं मन विस्मय भयऊ।।
राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य शपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
नर बानरहि संग कहु कैसें।
कहि कथा भइ संगति जैसें।।
भक्त कवि तुलसीदास रचित रामचरित-मानस से 
क्रमशः जारी …
संकलन – रंजन कुमार 
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