Spiritual emotional poetry: मार्ग पर बुद्धत्व के प्रियतम गए तुम

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मार्ग पर बुद्धत्व के 

प्रियतम गए तुम ,
मुझको कहो मेरा मार्ग क्या 

और अभीष्ट क्या ?

मार्ग में आड़े क्यों आया 
पिता का फर्ज 

और दायित्व भी पति का ?

छोड़कर मझधार में 

हमको अकेले
बुद्धत्व क्या तुम पा सकोगे ?


बूढ़े पिता पर राज्य छोड़ा ,
मुझ अबला पे छोड़ा ..

माँ और राहुल ..!

दोनों बड़ी है जिम्मेदारी ,
जो तुमको 
उठानी चाहिए थी  ,

स्वार्थ क्यों न कहूँ इसे 
तेरा कहो ये ?

निर्वाण तुझको मिल भी जाये
अगर तो 

उससे भला अब क्या हमारा ?

पर अनुगमन तेरा करुँगी ,
नहीं कोसती लो ,

अब सब हंसकर सहूंगी ..

प्रियतम गए निर्वाण हेतू ,

सालेगा मन पर ,
सबको हंस हंस कहूँगी ,
हाँ अनुमति ली है हमारी !


मन के मेरे जो भी हैं शंशय
एक बार आओ ,

स्वप्न में ही दूर कर दो ,
और मुझे इतना बताओ ..


मार्ग पर बुद्धत्व के 

प्रियतम गए तुम ,
मुझको कहो मेरा मार्ग क्या 

और अभीष्ट क्या ?

– रंजन कुमार