पसाकोलोजि भौजी और उनके मायके की दीपावली का रोजगार

#पसाकोलोजि_भौजी के घर मे दीपावली के बाद एक अलग ही परम्परा है जो पसाकोलोजि भउजी की दादी लहसुनगन्धा के बिआह होकर आने के बाद शुरू हुआ था..

लहसुनगन्धा जब अपने मायके में थी तब दीपावली के अगले दिन वह अपने पिता नवाब मिसिर के साथ पूरे गांव में दीपावली में प्रयुक्त दीये चुनकर लाती थी,फिर उसे झाड़ पोछ कर गेरू से रंग के अगले साल दीपावली में नवाब मिसिर कुर्था के बाजार में बेच आते थे तो नवाब को दो पैसे की आमदनी हो जाती थी!

रंडवे हो चुके बुड्ढे मास्टर रामदीन के घर जब दूसरी बीबी बन लहसुनगन्धा आयी थी तब यहाँ गरीबी और निर्धनता नहीं थी उसके मायके की तरह ..!

जिस निर्धनता की वजह से लहसुनगन्धा रंडवे,उसकी उम्र के दुगने बुड्ढे द्वाह मास्टर रामदीन से बियाही गयी थी ,क्योंकि बमुश्किल दो जून की रोटी का इंतजाम करते जान खपाते नवाब अपनी बेटियो की शादी भारी भरकम दहेज देकर कर पाने में सक्षम कहाँ थे..?

बहुते बड़का से अपनी बेटियो का व्याह करने की जिद में अंततः मास्टर रामदीन की दुल्हन बनी लहसुनगन्धा .नवाब की प्रतिज्ञा भी रह गयी न,बहुते बड़का से व्याहेंगे बेटी अपनी…तो मिल गया न बहुते बड़का,,उम्र से दुगना..!

हमारी पसाकोलोजि भौजी के पिताजी उसी नवाब के न नाती ठहरे..इन्होंने भी अपनी बेटी को बहुते बड़का से व्याह दिया…एकदम वैसे ही …तर्क भी जबरदस्त देते हैं पराजित मिसिर,,पसाकोलोजि भौजी के पापा…दुनिया का कहेगा ..कहेगा का ..?? जब पसाकोलोजि की दादी ..हमारी मम्मी भी रंडवे बुड्ढे द्वाह से बिआह कर के आयी थी तो दुनिया समाज का बोलिस था जे अब बोलेगा ..?

और इस तरह से नवाब के नाती उ पसाकोलोजि भउजी के पापा निकम्मे निठल्ले पराजित मिसिर ने बहुते बड़का से अपनी बेटी का बिआह कर अपने को नवाब का नाती प्रमाणित किया और पसाकोलोजि भौजी भी अपनी दादी की ही तरह उम्र से दुगने के साथ व्याह दी गयी,,20 की पसाकोलोजि और 40 साल का फ़रोफ्रेसर…

पसाकोलोजि भौजी की बहिनी सब अपने जीजा को पसाकोलोजि के बुड्ढे भतार जी आ गए कहकर ही सम्बोधित करती है जिससे टोले मोहल्ले की भाभियाँ भी पसाकोलोजि मइयां के बुड्ढे….ही कहने लग गयी

पसाकोलोजि भौजी की दादी लहसुनगन्धा जब बिआह कर के मास्टर रामदीन के घर आयी तब भी अपनी बचपन से जवानी तक की आदतें नहीं छोड़ पायी और दीपावली की अगली सुबह भर हाथ घूघा(घुँघटा) कर के निकल पड़ती थी दीये चुनने..!

फिर से उस दीये को झाड़फूंक के गेरू से रंग रोगन कर लालची लहसुनगन्धा कुछ दीये अपने पास पड़ोस में इसे बेच दिया करती थी और कुछ अपने मायके अपने पिता की गरीबी दूर करने में मदद करने के लिए भेज देती थी..कमासुत बेटी मायके को सम्भाले रखती है बिआह बाद भी,,यही लहसुनगन्धा कर रही थी,नवाब मिसिर की बेटी नवाब की गरीबी मिटाने की कोशिश..!!

वक्त की बहती नदी में गोते लगाते मास्टर रामदीन और लहसुनगन्धा ने जब अपनी औलादें पैदा कर ली तब इस मिशन में लहसुनगन्धा ने अपने बच्चों को भी साल दर साल दीपावली के दीये उठाने में लगाए रखा..!पराजित मिसिर अपनी बहनों के साथ बचपन से ही दीये चुनते रहे हैं गाँव घर मे..!पराजित मिसिर की तो आदत ही हो गयी है कि उनको कहीं चाय वाय भी पीने को मिल जाए तो उसमें से भी कप गिलास अपने बैग में चुपके से सरका लेते हैं यह सोचे बिना कि यहां किसी रिश्तेदारी में आये हैं !लहसुनगन्धा ने अपने बच्चों के अंदर यह संस्कार विरासत में भर दिया है!

जब पराजित मिसिर की चारो बेटियां भी अपनी बुआ संग दीये चुनती रहीं और बुआ की शादी होने के बाद इस मिशन में पसाकोलोजि भौजी अपनी अन्य तीनो बहनों के साथ मिलके,कुछ मोहल्ले के लँगोटिये यारों को भी साथ ले दूसरे दूसरे गांवों से भी दीये इकट्ठे करने शुरू किए जब और इकट्ठे किये गए दीयों की संख्या जब दस पंद्रह हजार तक पहुंचने लगी तब निकम्मे निठल्ले पराजित मिसिर ने इनके बिक्री की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली..

दो पैसे एक्स्ट्रा इनकम जुआरी पराजित मिसिर के एय्याशी के लिए बहुत हैं जो वह इन दीयों की बिक्री में दलाली कर अपनी माँ से बेईमानी कर बचा लेता है!

कुल मिलाकर प्रयुक्त दीये चुनने का कारोबार पसाकोलोजि भौजी के घर खूब जोरदर ढंग से हो रहा था तब जब पसाकोलोजि भौजी का व्याह हो गया!मास्टर रामदीन रिटायर हो पेंशन पर घर बैठ गए और निकम्मा पराजित मिसिर कुछ करता नहीं तो घर के इस एक्स्ट्रा इनकम में कमी न आए यह जिम्मेदारी भौजी के बिआह बाद शेष तीन बहनों पर आया जिसे बड़ी कुशलता से पसाकोलोजि भौजी की दूसरकी बहिनी की नेतृत्व में तीनों बहनों ने 7 साल निभाया!

अब जब पसाकोलोजि भौजी की दूसरकी बहिनी की भी शादी हो गयी तब यह जिम्मेदारी शेष दो बहनों पर आ गयी इस दीपावली में..!

अब पसाकोलोजि भौजी की सबसे छोटकी बहिनी शिम्पिया परेशान होने लगी..उसको गठिया हो गया है और दूसरी बहिनी को दौरे मिर्गी के मम्मी के मरने बाद से कभी भी पड़ते ही रहता है और फिर भी 15000 दीये बटोरने का दादी लहसुनगन्धा ने हुक्म सुना दिया…नहीं तो त्योहार में खाना बंद..इतना जुल्म पसाकोलोजि की बिना माँ की बहनों पर दादी का…!

शिम्पिया ने रो रो कर जब पसाकोलोजि भौजी को अपना हाल सुनाया तब दयालु पसाकोलोजि भौजी इसे सहन न कर सकी और अपने पीदना के संग पधारी है पीहर अपने ..परदेश में लोगो से बहाना बनाके,भैया दूज की..अब वहाँ पड़ोसियो को क्या पता कि कोई भाई है ही नहीं जब तो काहे की भैया दूज ??असली खेल तो दीपावली में 15000 दीये इकट्ठा करने में शिम्पिया को मदद करने का है जो दीपावली में पसाकोलोजि भौजी की दादी का खानदानी रोजगार है!

दस हजार दीये इकट्ठे भी हो गए हैं और पसाकोलोजि भउजी को यकीन है कि छठ पूजा खत्म होते होते और 5 हजार छठ घाट से मिल जाएंगे और शिम्पिया पर दादी का जुल्म नहीं होगा..!हमसे जब पसाकोलोजि भौजी ने अपना यह हाल किस्सा बताया दीपावली में तो हमने भी इसे डायरी में ज्यों का त्यों दर्ज कर लिया…पसाकोलोजि भौजी उपन्यास में छपेगा न ई सब…छपेगा किताब सुनके पसाकोलोजि भौजी हमारी हँस देती हैं खिलखिलाकर…तो हम भी खुश हो जाते हैं Alpana Mishra जी…हमारी भउजी की खुशी में हमारी भी खुशी मिल जाती है…!

क्रमशः जारी,,उपन्यास पसाकोलोजि_भौजी

रंजन कुमार 

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