Hindi poetry : पथरा गयीं आँखे इस पथ को तकते तकते – Ranjan Kumar

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Hindi Poery by Ranjan Kumar
 
 
पथरा गयीं आँखे 
इस पथ को तकते तकते ,
तुम फिर नहीं आए कभी 
यहाँ बरसों से !
 
तेरे वादों की पोटली थी 
जो मेरी धरोहर है ,
गुम हुयी है यहीं कहीं 
तलाश में अब तक हूँ !
 
मेरे लिए तो वक़्त ठहरा है वहीं
जहाँ पे हम बिछड़े थे ,
देखता रहता हूँ ,
दीवारें तक भी न क्यूँ महफूज रहीं !
 
नहीं सुनता कोई मेरी ,
मैं सबसे कहता हूँ ,
ये दौर कौन सा है 
क्यों हर चेहरा ही अनजाना है ?
 
वक़्त आगे बढ़ गया क्या बहुत ज्यादा 
मैं ठहरा रह गया इस बस्ती में ?
वो नाराज होंगे नहीं आते इधर ,
क्यों कोई पहचान वाला भी नहीं दिखता है ?
 
– रंजन कुमार