ईश्वर पथ में साधक को कुछ भी माँगना नहीं चाहिए – Ranjan Kumar

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ईश्वर पथ में यदि आप प्रवृत्त होते हैं, मनोकामनाओं की पूर्ति अयाचित होने लगती है । अतः साधक को कुछ भी माँगना नहीं चाहिए । आप अपनी क्रिया करते भर जायँ । भगवान जानते हैं कि आपका हित किसमें है वह वही व्यवस्था देंगे , इसलिए फल उनकी कृपा पर छोड़ दें ।
 
श्री रामचरित मानस का आख्यान है कि नारद जी ने दक्ष प्रजापति के पुत्रों को उपदेश देकर विरक्त सन्त बना दिया जिससे रुष्ट होकर दक्ष ने नारद को श्राप दिया कि वह किसी स्थान पर अधिक समय तक न रुक सकें , लोगों को वैराग्य की ओर वह प्रेरित न कर सकें ।
 
 श्राप से व्यथित नारद हिमालय की सुरम्य उपत्यका में भगवच्चिन्तन में डूब गये । भगवान की कृपा से श्राप का प्रभाव टल गया । वह अखण्ड समाधि की अवस्था तक पहुँच गये । उन्होंने काम पर विजय प्राप्त कर लिया । 
 
इस सफलता को उन्होंने अपनी उपलब्धि मान लिया । चिन्तन से विरत होकर वे इसके प्रदर्शन में प्रवृत्त हो गये । 
 
इसी क्रम में वह विश्वमोहिनी के स्वयंवर में जा पहुँचते हैं । कन्या के अलौकिक रुप एवं गुणों पर विमुग्ध नारद उससे विवाह के लिए आतुर हो उठे ।सहायता लेने वह भगवान के पास गये । उन्होंने विचार किया 
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति …
परमपद की इच्छावाले ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं । अभी तक हमने अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया हैै । यदि आज विवाह की इच्छा व्यक्त करुँ तो प्रभु अवश्य मना करेंगे । 
विश्वमोहिनी वरमाला उसे ही पहनायेगी जो सबसे अधिक रूप सौन्दर्यसम्पन्न हो । भगवान से सुन्दर कोई है भी नहीं ; क्यों न मैं इनसे इनका रुप ही मांग लूँ ।
उन्होंने प्रभु का रुप मांग लिया । भगवान ने भी ‘तथास्तु’ कहते हुए अपने अनन्त रूपों में से एक रुप हरि अर्थात बन्दर की आकृति प्रदान कर दिया । नारद अपनी योजना पर प्रसन्न हो रहे थे , उन्होंने कहा “प्रभो  जिसमें हमारा हित हो , वही कीजिएगा ।
जेहि बिधि होइहि परम हित ,
नारद सुनहु तुम्हार ।
सोइ हम करब न आन कछु ,
बचन न मृषा हमार ॥ (रामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १३२)
आप हित की बात करते हैं, हमने आपका परम हित सोच लिया है । नारद प्रसन्न थे कि काम तो बन गया लगता है । वह वहाँ से सीधे स्वयंवर स्थल पहुँचे ।
सबने उठकर नारद जी को दण्डप्रणाम किया ।नारद ने विचार किया कि मैं नारद तो हूँ नहीं, मेरा चेहरा भगवान का है तभी तो इतना तेज है कि सभी प्रणाम कर रहे हैं । 
भगवान शंकर के दो सेवक भी इस दृश्य का आनन्द ले रहे थे । वे व्यंग कर रहे थे क्या अनुपम सौन्दर्य है,साक्षात् हरि हैं । अब तो राजकुमारी इनका ही वरण करेंगी । राजकन्या को नारद भयंकर आकृति के बन्दर जैसे दिखायी पड़े ।
जेहि दिसि बैठे नारद फूली ।
सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली ॥
(रामचरितमानस, १/१३४/१)
क्रोधित राजकन्या ने उस पंक्ति की ओर देखा भी नहीं जिसमें नारद जी बैठे थे । एक ओर भगवान भी बैठे थे । कन्या ने उन्हें जयमाला पहनाया और उन्हीं के साथ चली गयी ।
अब तो नारद जी बहुत तड़पे । इतना बड़ा आघात वह सहन न कर सके । उन्होंने झटपट भगवान को श्राप दे डाला ।
जब हरि माया दूरि निवारी।
नहिं तहँ रमा न राजकुमारी ॥
(रामचरितमानस, १/१३७/१)
भगवान ने अपनी माया का आवरण ही हटा लिया । लक्ष्मी नश्वर और राजकुमारी भी नश्वर ।
नहिं तहँ रमा न राजकुमारी । सत्य जो कुछ था और आगे था । जब नारद जी की उस पर दृष्टि पड़ी, वह भगवान के चरणों में गिर पड़े कि आपने मुझे बचा लिया । हमारा श्राप व्यर्थ चला जाय ।
भगवान ने कहा वह भी मेरी इच्छा है ‘मम इच्द्दा कह दीनदयाला ।
इस प्रकार भगवान के प्रति कोई समर्पित होकर चलता है तो प्रभु जानते हैं कि इस जीव का हित किसमें है, वह वही व्यवस्था करेंगे । इसलिए ईश्वर-पथ , इस जटिल पथ के पथिक को कभी माँगना नहीं चाहिए । फिर वह कभी धोखा नहीं खा सकता ।
संकलन – रंजन कुमार